Thursday, 21 February 2019

आहटें

किसे खबर थी उन आहटों की
जो बन गई हैं जिंदगी हमारी
परदें की कपडे की हवा चलने से
हवा के रुख बदलने की बदलते मौसम के साथ
खिड़की भी कभी ठिठुरती सिमटती
रास्तेपर से कोई मोटर गहरी सांसे लेते
चलानेवाले के रहम के इंतजार में तकरार करती गुजरती
शहरों के सन्नाटें मशीनों की हुंकार से
गावों की रातें रात के कीड़ों के गुंजन से
कहीं दूर क्या वो बारात का ढोल और शहनाई?
या फिर किसी पुरनेसे नए मसले पर रैली हैं निकली?
टिकटिकती घडी का स्वर बढ़ती रात की संग बढ़ता
बीच में ठंडा पड़ा फ्रिज जैसे कुड़कुड़कर करवट बदलता
हाँ! अभी तीसरे मालेवाले पुजारी जी आरती गाएंगे
तभी तो पहले मालेवाले डाक्टरसाब घर जाएंगे
वो देखो अभी खानेपर टीवी गूंजेंगे
कल सुबह स्कूल बस के हॉर्न से पहले अलार्म जो चिल्लाएंगे
चिड़ियों की मुसकान सिर्फ छुट्टी के दिन की
सुबह तो मुर्गे से पहले उठकर दूध और अख़बार बांटनेवाले
जगाते हैं अपनी आहटें बांटकर
सहेलियों की हँसी और क्रिकेट मैच के ललकारें
पानी का टपकता नल और सब बाय हार्ट करता बंटी
बिलखती दो महीने की बेबी और रास्तें पर चिल्लाते कुत्ते
ऑफिस की मरम्मत में पिसती लकड़ियाँ और सिलबट्टे में लहसुन
कहीं गाने और नाच की प्रैक्टिस और कचरे की गाडी की घंटी
एक एक कर आवाजें भी न चाहते हुए रोज का रोना रोती
बिग बैंग के पहले छाए हुए चुप्पी को चीरती आहटें